इस्लाम की बेटियों....
मोहब्बत सिर्फ निकाह है और अगर निकाह नहीं है तो गुनाह है
( रिलेशनशिप )
अच्छी लड़कियों को पसंद करके उनका ईमान खराब कर के उन से इनबॉक्स में वादे कर के उनके पर्दे को धजिया बिखेर कर उन पर बुरी लड़कियों का लेबल लगा कर छोरने वालो
उन सबका अच्छे से इंतकाम लेने वाला ऐक अल्लाह रब्बुल इज्जत भी है उसका खोफ करो
लानत है ऐसी तरबियत गैरत और शराफत पर जो तुम लोगो से शुरू होकर तुम लोगो पर ही ख़तम होजाती है
ये कैसी तरबियत है जिस में जब सब लज्जत के मरहले हल करलिए तो उसके बाद लड़की के ऐैब दिखना शुरू होगया
और अपने सब मसाइल और मजबूरियां मुंह फारे नजर आना शुरू होगय ?
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कुछ शरम होती है कुछ हयां होती है यह ही वह लड़की और औरत थी जिस से बात करने के लिए कुछ दिन पहले मर रहे थे और अब उस से बात करते हुए मौत पर्ती है यही वह लड़की और औरत है जिस ने किसी कमजोर लम्हे में ऐक अहद बांध लिया तुम से मोहब्बत का मगर वह निकाह के दिलासे और आस पे था जीना पे नहीं अगर ऐक लड़की को तुम लोग निकाह के उम्मीद पे बे हिजाब करते हो तो उसका मतलब ये नहीं के वह लड़की बुरी है बल्के तुम बुरे हो जिस ने हलाल काम की तसल्ली देकर हराम काम किया वह लड़की और औरत मासूम थी शरीफ थी जिस की शराफत का तुम ने ऐसा मज़ाक उड़ाया के उस को खुद से नफ़रत होगई
अब वह सारी उमर सजदों में तुम्हारे लिए बद दुआ करेगी और अपने लिए तौबा ,
क्या पता के उस की तौबा रब को कितनी पसंद आए और उस ठोकर के बाद उस का शुमार पार्साओ में और जिक्रे रब के महफिलों में होने लगे. और तुम पर सख्त गिरफ्त आए और जहन्नम को तुम्हारा ठिकाना बनादिया जाएं.
उस लड़की का तुमसे निकाह का जिद करना लड़ना और झगरना ही उसकी शराफत की दलील है के वह तुमसे खेली नहीं बल्के खेली गई उसने जी नहीं बहलाया बल्के उस से जी बहलाया गया वरना तुम्हारे इन्कार पे वह युं ना टूटती यूं ना बिखरती यूं रब के आगे ना गिरगीराती यूं तौबा ना करती तुम कैसे बेगैरत मर्द थे के ये सब करके भी तुमने शराफत का लेबल नेकी पर्साई का लेबल लगाया हुआ है और ये कोन
मजबूरियां थी क्या ये उस से बात करने से पहले नहीं थी ?
उसको ख़्वाब क्यों दिखाई ?
मोहब्बत के रिश्ते पे लाने से पहले अपनी उमर, अपना कारोबार, अपना खानदान, फिर्का, रूसुमो रेवाज, जवान बहने, बीवी बच्चे, और दीगर मसाइल नजर क्यों नहीं आई ?
शयातिन है क्यों के शैतान ने ही ठीका लिया था इंसान को वार्गलाने का भटकाने का और बुराई पे माइल कर के उसको धतकरा हुआ छोर देने का
मै जानता हूं मेरे अल्फ़ाज़ कड़वा है और भाइयों की शराफत व गौरियत ऐक ताजियाना है क्यों के मैंने लड़कियों को ही रोते इज्जत बचाते अपने गुनाहों पे आंसू बहाते देखा है और बलैक मेल होते हुए भी
कभी किसी मर्द को ब्लैक मेल होते नहीं देखा क्या इज्जत सिर्फ मर्द की होती है क्या औरत ही अपने गुनाहों पे सारी उमर ऐक खोफ़ में ज़िन्दगी गुजारें ?
जो मर्द बराबर के उस गुनाह में शरीक है उनको क्या खौफ है.
इतनी सी शरम भी नहीं है के लड़कियां किस तरह मोआश्रती दबावों में में आ कर नादानी में अपनी जान लेलेती है क्यों के बदनामी का खौफ उसके बाद उनके दिल से जीने की खाहिशात को छीन लेता है, अपने मां बाप की बे इज्जती का ग़म उनको मार देता है, नादानी का ऐक गुनाह ऐक गलती उनसे सारी उमर छीन लेता है, काश के तुमलोगो को एहसास हो के जिस बेटी से तुमने खिला है कैसे लाडों में मां ने उसे पाली थी, कैसे सीने से लगा कर उस को रातो को सुलाया, खिलाया पिलाया, पढ़ाया,
उसकी शराफत की धजिया बिखेर कर कम से कम उसकी तशहिर तो ना करो कैसे बेटे हो और कैसे भाई हो तुम चलो मै मानता हूं के भाई नहीं हो तुम. तुम्हारी कोई बहन नहीं मगर कोई भी इंसान मां की कोख के बेगैर तो जन्म नहीं लेता तो ऐक मां तो है तुम्हारी ऐक बेटी तो होसक्ती है तुम्हारी और ऐक अदद बीवी भी तो बनेगी उस से अगर किसी ने ऐसे खेला ? तुम कैसे उसको अपने जैसे नेक दरिंदे से बचाओगे ??
यहां मै मां बाप के आगे भी हाथ जोरूंगा के अपने बेटियों से प्यार करे उनको समझाए के क्या सही है, क्या ग़लत, और उसके बाद उनको भरोसा दे के अगर कोई गलती या गुनाह होजाता है तो उसकी तौबा है उसकी मॉफी है कोई भी जुर्म नाकाबिले मॉफी नहीं है खुदकुशी की राह ना अपनाएं क्यों के गुनाह की तो तौबा के लिए ज़िन्दगी है मगर हराम मौत की तौबा के लिए कुछ भी नहीं बाक़ी

Masha Allah
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